तलाश से मुलाकात तक का सफ़र

खुद को तलाशते महीने हो चुके थे। कभी नदी किनारे तो कभी खुले आसमान तले, कभी यू पक्षियों की चहचहाती शाम में तो कभी अमावस की घनी रात में। मैं ढूंढती ख़ुदको दोस्तो के हँसी ठहाको में लेकिन कही न कही रह जाती थी मायूसी मेरे नाम। कोशिश तो बेइन्तहां करती की दुनिया की इस चकाचौंध में शायद मैं घुल सी जाऊ, मुम्बई की बारिश की तरह बह सी जाऊ, सम के उस रेगिस्तान में लिपटी मैं खो जाऊ लेकिन न जाने क्यों, हमेशा ख़ुदको अकेला पाया मैंने या कहु की सबसे अलग पाया मैंने।

मैं दुनिया के इस शोर में इतनी बेसब्री से ख़ुदको तलाश रही थी की कभी ये ना सोच पाई की शायद मैं अपने कमरे में भी मिल सकती हूं ख़ुदको। अचानक मेरी नज़र उस आईने पर पड़ी। ज़रा सी दरार थी कोने में, ठीक उसी जगह जहा मेरा माथा नज़र आता था। मेरी नज़रे आईने के उस तरफ खड़ी लड़की से मिली, हूबहू थी तो मेरी तरह बस उसकी वो मुस्कान मुझे उससे जुदा कर रही थी। कुछ यूं मैं उसकी आँखों मे खो सी गई, की धीरे- धीरे दुनिया का शोर थम सा गया और शायद मुझे बड़े लम्हो बाद अपने दिल की धड़कने सुनाई दी।

कुछ यूं हम दुनिया के शोर में खो जाते है कि कभी कभी हमे अपने दिल की आवाज़ ही सुनाई नही देती। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।

नज़रे उसकी आँखों मे बसी हुई थी, धड़कने ज़रा सी बढ़ी हुई थी, पता नही क्यों आँखें नम हो गई। अकेले होने का डर नही था, कोई ऐसा साथ था जो सचमे अपना था। कोई दिखावा कोई मुखौटा नही, वो सपना नही वो अपना ही था। मैं रो पड़ी, आंसू थमे नही और मैं उन्हें थामना भी नही चाहती थी। वो सामने खड़ी लड़की अब भी एक टक मुझे देख रही थी और मैं सरेआम अपने उदासी की नुमाइश कर रही थी।

फिर एक पल आया जब मेरे आंसू थम गए, अपने आप वो रुक गए, शायद दर्द अब खत्म हो चला था। बड़े सालो से ये छुपा रखा था दिलमे आज वो बह चला था। आज तो मानो आंसू पोछने की भी ज़रूरत नही पड़ी। क्योंकि मैं तो रोती रही तबतक जबतक आँखें सूख ना गई। वो मुस्काई और मैं नम आँखें लिए उसे देख निहारती रही। निहारती रही तबतक जबतक मैंने ये ना देख लिया कि मेरे आखों के नीचे कालापन था, और मेरे कान सूने थे। वक़्त की घड़ी भी कही खोई हुई थी और होठ ज़रा रूखे से थे। उंगलियों में अब बस पुराने अंगूठी की वो निशानी रह गई थी और पैरों से पाज़ेब का मिलन ज़माने पहले हुआ था।

मन मे ख़याल कुछ यूं थे कि क्या ढूंढने निकली थी मैं? ऐसा क्या ढूंढने में व्यस्त थी कि मैं ख़ुदको ही भूल गई। उस सन्नाटे में मानो एक शोर था, जो चीख़ चीख़ कर मुझसे कह रहा हो कि देखो ख़ुदको, क्यों तुम इतनी बदल गई हो। कुछ यूं सवालो में उलझी थी मैं जीवन के की जीवन जीना ज़रा भूल गई थी। भूल गई थी कि मेरी पहचान मेरे मुझ जैसे होने से थी नाकी दूसरो जैसे होंने से।

कुछ यूं नज़र मेरी ड्रावर में पड़ी पाज़ेब पर पड़ी और मेरे हाथों में आते ही मानो वो छन से खिलखिला उठी। मैंने ज़रा भी देर न कि और उन्हें पैरों में पहन लिया। वो छन छन बजती रही और मेरा दिल धड़कता रहा। कुछ यूं मैंने काजल आखों में भरे, होठ लाल रंगे, बालियां पहनी और अपने जूड़े से बालों को आज़ाद किया। वो हवा में ऐसे लहराए मानो सालो की गिरफ्त से बाहर आए हो। आज नज़रे शीशे के उस टूटे छोर पे नही बल्कि माथे की बिंदी पर थी। कुछ यूं पायल कह रहे थे कि अब कदम मेरे ही मुझे गुनगुनाने लगे थे। लबो पे एक गाना आया “आज मैं उप्पर, आसमान नीचे”। और इन पंक्तियों को गुनगुनाते हुए मेरी मुलाकात समाप्त हुई, ख़ुदसे। ज़हन में युही एक सवाल सा था की क्यों नही ये मुलाकात पहले करली मैंने। क्यों नही ये मुलाकात रोज़ करती रहू मैं।

Advertisements

|| कुछ ऐसी है वो ||

|| बेवजह चाय बदनाम है
वो सावली तो चाय से भी निराली है

बदमस्त बेमौसम बरसती गरजती
वो मौसमों को अपनी गिरफ्त में रखती

खोया सा जैसे बचपन कोई
बेवज़ह सी मुस्कान हो वो

समाज की बेड़ियों में घुँघरू बाँध
बेतहाशा धुन पे थिरकती जो

कुछ यूं बारिश की बूंदें उसे छूती
जैसे मानो मोती को लहरे तराशे

रेत सी सरकती हाथो से सबके
शितिज का पीछा करती वो

दसो दिशाओं में पंख फैला
उसे शौक़ था बड़ा बादलो के सैर का

गिरती संभालती हवा का पीछा करती
जुगनू से पल सॅवारती वो

तितलियों को अपनी हथेली पे रख
फूलों का रंग अपने दुपट्टे में सजाती वो

इस कदर बेखौफ़ अपने
कदमों को आगे बढ़ाती वो

लहरे कदम चूमते उसके
चांद मुस्कुराकर ताज सा सजता उसपे

गीली रेत को अपने नाम कर
पद चिन्ह हर जगह छोड़ जाती वो

बस एक हल्की सी मुस्कान
दे जाता उसका होना

वैसे ही जैसे छुअन हो हल्का सा
एक ठंडे हवा के झोंके का ||

* अल्हड़ सी वो *

।। ज़्यादा लोग दीवाने नही मेरे

उन्हें मेरी अल्हड़ता पसंद नही

और मुझे दूसरों की पसंद का

मुखौटा रास नही आता ।।

।। कुछ यूं मुझे लोग कह जाते है

की तुम किसीकी सुनती क्यों नहीं

मैं कैसे उनके शब्द अपने ज़हन में उतारू

जिन्होंने मेरी कभी सुनी ही नही ।।

।। मुझे रफ़्तार पसंद हैं कुछ यूं

कोई पीछा ना कर पाए मेरा सूनी सड़क पर

शोर से डर नही लगता

बस सन्नाटा रूह में कपकपी सी भर देता है ।।

।। माना मुझे तमीज़ नहीं बात करने की

लेकिन तहज़ीब है अदब निभाने की

इज़्ज़त मन से करना सीखा हैं

पैर छूकर भी इज़्ज़त लुटते देखा है ।।

।। मुझे फटी जीन्स पहने देख

उनकी नज़रे भटक सी गई

चलो इसी बहाने मेरी छाती से नज़र हटा

कही और उनकी निगाहें तो गई ।।

।। बाल बिखरे पसंद थे कुछ यूं

बंधी तो म भी थी बंदिशों में

बस सोचा की इन ख़ूबसूरत लटो की

आज़ादी छीनकर उन्हें गिरोह में क्यों रखूं ।।

।। अल्हड़ता की हद तब हुई

जब खुले आसमान में चाँद देखना नसीब न हुआ

कुछ यूं चाँद ने मेरा साथ निभाया

मुझ अल्हड़ से मिलने वो मेरी खिड़की पे आया ।।

घोंसला

परिंदे सा वो था किसी

मंज़िल की तलाश में

यूं राह चलते मिली थी उससे

और ना जाने क्यों

राह साथ चलने की चाह सी हुई थी

बड़े पथरीले से रास्ते थे

और हाथ थामने में सुकून सा था

उसकी कहानियों से रूबरू थी

उसकी तृष्णा समझ आती थी मुझे

ख़ूबसूरत पंख लिए वो परिंदा

सैर पे निकला तो था

ना जाने क्यों मगर

ज़रा डरा सहमा सा था

शायद कभी चोट लगी थी उसे

आखें दर्द बयां करती थी

मगर लब कराहते ना थे

उलझने समझती थी मैं उसकी

अध खुले पंख उसके

डराते थे मुझे

उड़ान पक्की थी उसकी

ना जाने क्यों आसमान से खफ़ा था

उसका आसमान उसका इंतज़ार

कर रहा था और मैं

वो छाओं बनना चाहती थी

जिसपे आकर वो अपना घोंसला बनाए।

Virtually fitted

Broken promises broken dreams

I sat steady in the morning

With my mixed feelings

Tried to get up early today

Breathing heavily as lumps in throat stayed

My legs were heavy

They couldn’t take steps

I tried to walk but my mind said rest

Flickering lights and blurry noises

Searching for my glasses

To make clear choices

Tea or coffee was I thinking

Heart said you are sinking

When getting up and sleeping more

Were mere choices

What I had were nothing but

left over inner voices

Dumb and messy

Were my hairs and my face

Bumps on my skin

And the last night tresses

Wanted to splash my face

With the purest water

Carried my body up

And cursed it further

Struggled hard to get it

Under the hot shower

Scars visible in the

Mirror afront

Lost was I in the

Wounds of the past

Putting on some Kohl and lipstick

I tried being no pitty

Took my phone and

Clicked pictures pretty

Posted it to the virtual world

Had choices had filters

Moon Mayfair black and white

For all of it my

Real world deprived

My real was virtually fitted

My real was virtually fitted

मिलूंगी तुझे तेरे सिरहाने

मैं मिलूंगी तुझे उन
सिली हुई दीवारों में भीनी सी सिसक लिए
उन बारिश की बूंदों में जो
बेवक़्त बेवज़ह सी बरसी
अपने साथ सारी धूल समेटे
छोड़ गई पाक सी धरती
मैं शायद उन बेवज़ह उलझी
लटो में सुलझ जाऊ
उन थिरकते कदमों में
शायद मैं कही बहकी हुई
दबे पांव तुझे थिरकना सिखा जाऊ
उन कदमों की आहट में
उस धूल में जो साथ चलते
पैरों संग घर आ जाया करती
मिलूँगी तुझे हवा में
मिलूँगी तुझे माटी संग
पास ही हु तेरे मिलूंगी तुझे हर उस पल
जब दर्द से तू कहरे जब तुझे
सहारे की ज़रूरत हो जब तेरे
कदम ज़रा डगमगा से जाए
तू जल जाए तो मरहम हु मैं
तुझे ताप लगे तो शीत हु मैं
मिलूंगी तुझे थपकियों में
तेरे सिरहाने
तेरे साए में हु मैं। 🌺

🌻
।। उलझे से कुछ हम थे
उलझे से रिश्ते नाते
उलझे थे जज़्बात हमारे
उलझी सी थी रातें ।।

।। यू लिपटी बेलो सी
ख़यालो में मैं तेरे
जैसे शिवलिंग से सर्प
गले लग करे बातें ।।

।। तारो सा पिरोया हुआ
नसीब तेरा सवार दूँ मैं
बस में हो मेरे अगर
तो तुझे अपना बना जाऊ मैं ।।

।। तू नदी का दूसरा छोर
मैं अल्हड़ सी बहती हवा
तू रेत सा फिसलता रहा
उंगलियों से मेरी हर दफ़ा ।। 🌻